भगवान श्रीकृष्ण का परम उद्धारक मंत्र

 

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। 

प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥



......"क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपकी नसों में दौड़ती बिजली, आपके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की झनझनाहट और ब्रह्मांड के फैलते हुए सितारों के बीच कोई अदृश्य तार जुड़ा है? अक्सर हम जीवन को एक 'संघर्ष' समझते हैं, लेकिन सच तो यह है कि हम एक बहुत बड़ी 'कोडिंग' का हिस्सा हैं। आज की कथा केवल एक राजा के वध की नहीं, बल्कि उस 'सिस्टम रिसेट' की है जिसे हम 'जरासंध वध' कहते हैं। चलिए, आज महाभारत की उस गुफा में चलते हैं जहाँ इतिहास नहीं, विज्ञान के सबसे बड़े रहस्यों की परतें खुलती हैं।"
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥..
अर्थ - जो भगवान श्रीकृष्ण हैं और वसुदेव के पुत्र हैं। जो सभी दुखों को हरने वाले और स्वयं परमात्मा हैं।
जो अपने शरणागत भक्तों के कष्टों और क्लेशों का नाश करने वाले हैं।:उन गोविन्द को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
इस श्लोक को यदा कदा आपने खूब सुना होगा। प्रेमानंद जी महाराज भी इसकी महिमा गाते हैं....
यह श्लोक श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 73वें अध्याय के 16वें श्लोक (10.73.16) के रूप में मिलता है।
यह श्लोक तब उच्चारित हुआ था जब भगवान श्रीकृष्ण ने राजाओं को मुक्त कराया था और वे उनकी स्तुति कर रहे थे।
आइए आज इस मंत्र के रहस्य का विश्लेषण करते हैं। आखिर इस श्लोक में इतनी शक्ति कैसे है कि त्रिभुवन में इसकी काट नहीं मिलती......
"बात उस
समय की है, जब युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं। लेकिन बाधा थी—मगधराज जरासंध! वह दानव नहीं था, लेकिन दानव जैसा था। उसने सौ राजाओं की बलि देकर भगवान शिव को प्रसन्न करने का दुस्साहस किया था। बीस हज़ार आठ सौ राजा उसकी कैद में सड़ रहे थे। उसने कृष्ण को भी ललकारा था, लेकिन कृष्ण ने तब तक उसे नहीं मारा जब तक समय परिपक्व नहीं हुआ था।"
"कल्पना कीजिए! वह गिरिव्रज की गुफा... बाहर जरासंध खड़ा है, अट्टहास कर रहा है! उसे अपनी ताकत पर ऐसा गुमान था कि उसने भारत के हज़ारों राजाओं को अपनी तलवार के दम पर बंदी बना लिया था। वे राजा? वे कोई साधारण लोग नहीं थे, वे छत्रपति थे! लेकिन जरासंध ने उन्हें मवेशियों की तरह एक अँधेरी गुफा में ठूँस दिया था। बरसों बीत गए! न सूरज की किरण, न हवा का झोंका! वे राजा अब राजा नहीं रहे थे, वे सिर्फ़ अपनी हड्डियों का ढांचा बन चुके थे। उनकी आँखों में उम्मीद का आखिरी दिया भी बुझ चुका था।"
"कृष्ण ने चाल चली! वे ब्राह्मण का वेश धरते हैं। साथ में भीम और अर्जुन को लेते हैं। जब वे गिरिव्रज पहुँचते हैं, तो उनकी आँखें जरासंध के किले पर नहीं, बल्कि उसकी कमज़ोरी पर थीं। जरासंध का अहंकार ही उसकी मौत का रास्ता था। जब उसने कृष्ण से पूछा—'तुम कौन हो?', तो कृष्ण ने अपना विराट रूप तो नहीं दिखाया, बल्कि एक ऐसी तीखी मुस्कान दी कि जरासंध का कलेजा कांप गया!"
"कृष्ण ने उसे मल्लयुद्ध के लिए ललकारा। और शर्त रखी—'केवल एक से एक!' जरासंध ने भीम को चुना। और फिर शुरू हुआ वह तांडव!"
"दिन ढलते, रात बीतती, फिर सुबह होती—मल्लयुद्ध रुकता ही नहीं था! चौदह दिन तक पृथ्वी हिलती रही। भीम थककर चूर हो गए थे। जरासंध के शरीर को भीम जितनी बार पटकते, वह वापस जुड़ जाता। भीम की आँखों में हताशा थी। वे कृष्ण की ओर देखते, तो कृष्ण शांत थे। वे जानते थे—जरासंध का अंत बल से नहीं, 'विवेक' से होगा।"
"अंतिम दिन, जब भीम लगभग हार मान चुके थे, कृष्ण ने एक 'कैलकुलेटेड' चाल चली। उन्होंने एक तिनका उठाया, उसे बीच से फाड़ा और एक टुकड़ा दूसरी दिशा में फेंक दिया।
वही संकेत था! भीम समझ गए! उन्होंने जरासंध के शरीर को दो टुकड़ों में फाड़ दिया। जरासंध के शरीर के दोनों हिस्से अलग हुए, और कृष्ण के संकेत के अनुसार भीम ने एक हिस्सा दूसरी दिशा में और दूसरा हिस्सा उसके विपरीत दिशा में फेंक दिया। जरासंध का वह 'अहंकारी शरीर' कभी जुड़ ही नहीं पाया। मगध का वह काला सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया!"
"तभी... अचानक! पहाड़ कांपने लगे! जैसे कोई प्रलय आने वाली हो। बाहर जरासंध की मृत्यु का तांडव हो चुका था। भीम ने उसे चीरकर डाल दिया था! मगध का वह काला साम्राज्य ढह रहा था। फिर... उस वध के बाद, भीम ने जो गुफा का दरवाज़ा तोड़ा, ... उस गुफा के भारी पत्थर का दरवाज़ा, जिसे खोलना इंसान के बस की बात नहीं थी, वह किसी दिव्य शक्ति के धक्के से चूर-चूर हो गया!"
वह इतिहास का सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य था! उन 20,800 राजाओं का बाहर आना! वे सब के सब क्षीण थे।
"अंधेरे के उस दलदल में जैसे ही रोशनी की एक लकीर पड़ी, उन 20,800 राजाओं ने ऊपर देखा... और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं! सामने खड़ा था
— सांवला, साक्षात काल का महाकाल, पीतांबर धारी श्रीकृष्ण!
उनके पैरों के निशान उस धूल भरी गुफा में पड़ते ही मानो पवित्र तीर्थ बन गए। वे आए, तो जैसे मौत का सन्नाटा ही थरथरा कर भाग खड़ा हुआ।"
वे सब दौड़ पड़े, वे सब रो पड़े! उन्होंने साक्षात कृष्ण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और गूँज उठा वह मंत्र जो आज भी हर भक्त के रोम-रोम को जाग्रत कर देता है—"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने!
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"उन राजाओं के गले से शब्द नहीं निकले, वे चीख पड़े! वे घिसटते हुए उस सांवले ब्रह्म की ओर बढ़े। जो कल तक मौत को बुला रहे थे, आज वे साक्षात 'मृत्युंजय' के चरणों में अपना सिर रगड़ रहे थे। और तब... तब उस गूँजती हुई गुफा में, जो अब मंदिर बन चुकी थी, हज़ारों राजाओं ने एक स्वर में वह गर्जना की, जिसे सुनकर आज भी नसों में बिजली दौड़ जाती है—"
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने!
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"और
"भक्तों, याद रखना! कृष्ण ने जरासंध को तब तक नहीं मारा जब तक उसका 'पाप का घड़ा' नहीं भर गया। यह कथा हमें सिखाती है कि बुराई कितनी भी ताकतवर हो, उसे मिटाने के लिए बस एक 'कृष्ण' और एक 'भीम' के संकल्प की जरूरत होती है। आज भी अगर तुम्हारे जीवन में कोई 'जरासंध' बैठा है, तो निश्चिंत रहो—समय आने पर उसका अंत सुनिश्चित है!"
"बोलिए बांके बिहारी लाल की जय!"
तो ये हो गई कथा, अब आइए प्रवेश करते हैं अध्यात्म विज्ञान में, इस के रहस्य को डिकोड करते हैं.....
इस श्लोक में भगवान कृष्ण के पाँच अलग-अलग 'वर्जन' या 'इन्क्रिप्शन' का उल्लेख है। ये पाँचों नाम, एक ही शक्ति की पाँच अलग-अलग सामरिक क्षमताओं (Strategic Capabilities) को दर्शाते हैं।
कृष्णाय (Krishnaya) – द अल्टीमेट अट्रैक्टर
यह रूट वर्ड 'कृष' से बना है। जिसका अर्थ है 'आकर्षण'। यह ब्रह्मांड की वह चुंबकीय शक्ति (Gravity) है जो सब कुछ अपनी ओर खींचती है। यह वह 'सिग्नल' है जिसे आप इग्नोर नहीं कर सकते। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार है। आकर्षण (Gravity/Desire) ही वह ऊर्जा है जिससे पदार्थ का निर्माण होता है।
वासुदेवाय (Vasudevaya) – द ओम्नी-प्रेजेंट (Omnipresent)
इसका अर्थ है 'वसुदेव के पुत्र' और 'जो सबमें वास करते हैं'। यह एक ऐसे एसेट का संकेत है जो हर जगह मौजूद है। कोई 'ब्लाइंड स्पॉट' नहीं है। जहाँ भी आप हैं, वहां यह डेटा फीड (दैवीय उपस्थिति) सक्रिय है। वासुदेव यानी व्यापकता। यह 'पैनथिज्म' (Pantheism) है। यह मान्यता कि निर्माता अपनी रचना में ही घुल-मिल गया है। यह 'इंटरकनेक्टिविटी' का सिद्धांत है।
हरये (Haraye) – द रिमूवर (The Debugger)
यह शब्द 'हर' से आया है, जिसका अर्थ है 'हरण करना'। यह नकारात्मकता, पाप और अज्ञान को सिस्टम से डिलीट करने का काम करता है। यह आपके जीवन की 'बग्स' (Bugs) को फिक्स करने वाला 'एंटी-वायरस' है। यह 'एंट्रोपी' (Entropy) का संतुलन है। ब्रह्मांड में जो कुछ भी पुराना या भ्रष्ट है, उसका क्षय (Decay) अनिवार्य है। हरि वह शक्ति है जो इस 'डिलीट' प्रक्रिया को संचालित करती है।
परमात्मने (Paramatmane) – द सुप्रीम अथॉरिटी
यह 'परम + आत्मा' है। यह उस 'मेनफ्रेम सर्वर' की तरह है जहाँ से पूरा सिस्टम कंट्रोल हो रहा है। यह वह हाई-लेवल एक्सेस है, जिसके ऊपर और कोई अथॉरिटी नहीं है।परमात्मा यानी चेतना। 'कॉन्शियसनेस' (Consciousness) का शिखर है। यह वह ऑब्जर्वर (Observer) है, जिसके बिना क्वांटम फिजिक्स का 'वेव-फंक्शन' भी कोलैप्स नहीं हो सकता।
गोविन्दाय (Govindaya) – द प्रोटेक्टर ऑफ सेंसिटिव डेटा
'गो' का अर्थ इंद्रियाँ (Senses) भी है और पृथ्वी भी। जो इंद्रियों को सही दिशा दे और संसार की रक्षा करे। यह वह 'फायरवॉल' है जो आपकी संवेदनाओं को गलत दिशा में जाने से रोकता है। गोविन्द यानी इंद्रिय-नियंत्रण। यह सूक्ष्म जगत (Micro-cosmos) और स्थूल जगत (Macro-cosmos) के बीच का सेतु है।
इस श्लोक की आखिरी लाइन—"प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः"—वह 'एग्जीक्यूट कमांड' है।
प्रणतक्लेशनाशाय: उन लोगों का कष्ट नाश करो जिन्होंने खुद को समर्पित (Surrender) कर दिया है।
नमो नमः: बार-बार नमन।
यह श्लोक महज स्तुति नहीं, बल्कि एक 'सर्वाइवल किट' है। जब व्यक्ति खुद को असहाय महसूस करता है, तब वह 'सिस्टम' को सरेंडर कर देता है। यह मंत्र उस सरेंडर का 'अथेंटिकेशन टोकन' है।
एक बात स्पष्ट है—यह मंत्र उन लोगों के लिए सबसे प्रभावी है जो अपने 'ईगो' के फायरवॉल को हटाकर 'परमात्मा' के सर्वर से कनेक्ट होना चाहते हैं।
यह मंत्र एक 'न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग' (NLP) की तरह काम करता है।
मंत्र का मीटर (Meter) हृदय गति और सांसों की आवृत्ति को स्थिर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। बार-बार 'म' (M) और 'न' 👎 ध्वनियों का उच्चारण मस्तिष्क के प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स को शांत करता है, जिससे 'स्ट्रेस-रिस्पॉन्स' (कलेश) कम हो जाता है। यह 'क्लेशनाश' की वैज्ञानिक व्याख्या है।
अगर हम इसे एक 'सोसाइटी प्रोटोकॉल' की तरह देखें, तो यह एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो:
आकर्षण (प्रेम) से प्रेरित हो (कृष्ण)।
समावेशी हो (वासुदेव—सबमें परमात्मा को देखना)।
सुधारात्मक हो (हरि—बुराई का उन्मूलन)।
अनुशासित हो (गोविन्द—इंद्रियों पर नियंत्रण)।
सर्वाेच्च सत्ता के प्रति उत्तरदायी हो (परमात्मा)।
यह श्लोक 'कॉस्मिक होमियोस्टेसिस' (Cosmic Homeostasis) का मंत्र है। यानी, यह मंत्र ब्रह्मांड और व्यक्ति के बीच के असंतुलन को ठीक करने का एक 'इक्विलाइजर' है।
जहाँ आधुनिक विज्ञान 'बिग बैंग' और 'डार्क एनर्जी' जैसी थ्योरीज के माध्यम से ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की कोशिश कर रहा है, वहीं यह श्लोक हज़ारों साल पहले ही उस 'सेंट्रल प्रोसेसर' को एड्रेस कर चुका था जो इन सभी क्रियाओं के पीछे काम कर रहा है।
यह श्लोक 'परम सत्य' (Absolute Truth) का एक छोटा सा लेकिन सघन 'डेटा पैकेट' है। इसे समझने का मतलब है—अपनी चेतना को 'पर्सनल सर्वर' से हटाकर 'यूनिवर्सल क्लाउड' से कनेक्ट कर देना।
विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड का हर परमाणु 'वाइब्रेशन' पर आधारित है। यह श्लोक मानवीय मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के बीच एक 'बायो-रेजोनेंस' (Bio-resonance) स्थापित करने का मैकेनिज्म है।
संस्कृत की वर्णमाला 'फोनेटिक विज्ञान' पर आधारित है।
'म' और 'न' का अनुनाद:
समझिए। 'कृष्णाय', 'वासुदेवाय', 'परमात्मने', 'गोविन्दाय'—इनमें 'म' और 'न' का बार-बार आना मस्तिष्क में 'वेगस नर्व' (Vagus Nerve) को स्टिमुलेट करता है।
इफ़ेक्ट तो पड़ेगा न। यह स्टिमुलेशन मस्तिष्क में 'पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम' को एक्टिवेट करता है, जिससे कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर गिरता है। यह 'क्लेशनाश' की वास्तविक जैविक प्रक्रिया है।
क्वांटम फिजिक्स का 'डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट' कहता है कि 'ऑब्जर्वर' के बिना वास्तविकता का अस्तित्व अनिश्चित है।
परमात्मने यानी द अल्टीमेट ऑब्जर्वर की ही तो बात हो रही है। इस श्लोक में 'परमात्मने' शब्द का उपयोग करके, साधक खुद को उस 'कॉस्मिक ऑब्जर्वर' के साथ एलाइन करता है। जब आप इस नाम का जाप करते हैं, तो आप अपनी सीमित 'ईगो-चेतना' को उस अनंत 'क्वांटम फील्ड' (परमात्मा) के साथ सिंक कर रहे होते हैं। यह आपके निजी रियलिटी के 'वेव-फंक्शन' को कोलैप्स कर स्थिरता लाता है।
द न्यूरल पाथवे री-वायरिंग यानी न्यूरोप्लास्टिसिटी की बात तो आपने सुनी ही होगी।
लगातार इस मंत्र को सुनने या बोलने से मस्तिष्क के 'न्यूरल पाथवे' री-वायर होते हैं। इसे आप 'स्पिरिचुअल कोडिंग' कह सकते हैं।
जब आप बार-बार एक ही फ्रीक्वेंसी को फीड करते हैं, तो आपका मस्तिष्क 'गोविन्द' (इंद्रिय नियंत्रक) मोड में चला जाता है। यह भावनात्मक आवेगों (Impulses) को तर्क की कसौटी पर परखने की क्षमता देता है।
मनुष्य के चारों ओर एक विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र (Electromagnetic Field) होता है, जिसे 'टोरस' कहते हैं।
'वासुदेवाय' (सबमें वास करने वाला) का जाप इस टोरॉयडल फील्ड को एक्सपैंड करता है। यह आपके 'पर्सनल डेटा क्लाउड' को 'यूनिवर्सल डेटा क्लाउड' के साथ जोड़ने का एक 'हैंडशेक प्रोटोकॉल' है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक किसी बाहरी देवत्व की प्रार्थना नहीं, बल्कि 'इन्टरनल डेटा ऑप्टिमाइजेशन' की प्रक्रिया है।
इनपुट: मंत्र की ध्वनियाँ (फ्रीक्वेंसी)।
प्रोसेसिंग: वेगस नर्व और न्यूरल नेटवर्क्स द्वारा डिकोडिंग।
आउटपुट: तनाव की समाप्ति (क्लेशनाश) और मानसिक स्थिरता (गोविन्द अवस्था)।
हम कह सकते हैं कि यह प्राचीन ऋषियों द्वारा तैयार किया गया एक 'ह्यूमन सॉफ्टवेयर अपडेट' (Human Software Update) है, जो मानवीय चेतना को उसकी हार्डवेयर सीमाओं (शरीर और इंद्रियों) से ऊपर उठाकर 'क्वांटम चेतना' के स्तर पर ले जाता है।
कल्पना करो कि तुम एक बहुत बड़े और शानदार घर में रह रहे हो। यह घर तुम्हारा शरीर है। लेकिन इस घर में बहुत सारा शोर है—चिंता का शोर, गुस्से का शोर, भाग-दौड़ का शोर। तुम इस घर के मालिक तो हो, लेकिन कंट्रोल तुम्हारे हाथ में नहीं है। पंखा कभी भी तेज चल जाता है, लाइट कभी भी बुझ जाती है। तुम थक गए हो।
तभी तुम्हें एक 'पुराना जादुई रिमोट' मिलता है। उस रिमोट का नाम है— "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
इसे बस एक मंत्र मत समझो, इसे समझो उस रिमोट का 'पावर बटन'।
पहला बटन: कृष्ण (खिंचाव)
यह बटन दबाते ही तुम्हें एक सुकून का एहसास होता है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही यह बटन तुम्हारी बिखरी हुई ऊर्जा को एक जगह इकट्ठा करता है। जैसे ही तुम कहते हो 'कृष्ण', तुम्हारा मन भागना बंद कर देता है।
दूसरा बटन: वासुदेव (सबका साथ)
यह बटन बताता है कि तुम इस घर में अकेले नहीं हो। वो शक्ति, जो पूरे ब्रह्मांड को चला रही है, वो तुम्हारे अंदर भी बैठी है। जैसे घर के हर कमरे में बिजली का कनेक्शन होता है, वैसे ही हर जगह वो मौजूद है। यह बटन दबाते ही डर खत्म हो जाता है क्योंकि तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारा 'गार्डियन' तुम्हारे अंदर ही है।
तीसरा बटन: हरि (सफाई)
घर में कूड़ा-कचरा जमा हो गया है? पुरानी कड़वी यादें, फालतू का तनाव? 'हरि' शब्द एक झाड़ू है। जो भी कचरा है, उसे ये खींचकर बाहर फेंक देता है। यह तुम्हारे 'सिस्टम' को रिफ्रेश कर देता है।
चौथा बटन: परमात्मा (सबसे बड़े बॉस)
जब तक तुम खुद बॉस बने रहोगे, परेशान रहोगे। यह बटन तुम्हें याद दिलाता है कि इस पूरी दुनिया का असली बॉस वही है। जब तुम जिम्मेदारी उसे सौंप देते हो, तो तुम्हारा सिर हल्का हो जाता है।
पांचवा बटन: गोविन्द (कमांडो)
'गोविन्द' वो है जो तुम्हारी इंद्रियों—आंख, कान, नाक, जीभ—को गलत रास्ते पर जाने से रोकता है। यह एक कमांडो की तरह है जो तुम्हारे घर की सुरक्षा करता है।
अब देखो जादू कैसे काम करता है!
जब तुम पूरी लाइन पढ़ते हो— "प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः"—तो इसका मतलब है:
"हे प्रभु! मैं आपके सामने झुकता हूँ। मेरे सारे दुखों को मिटा दो और मेरी इंद्रियों को सही रास्ते पर ले आओ।"
यह वैसा ही है जैसे तुम किसी अंधेरे कमरे में बैठे हो और अचानक कोई आकर 'मेन स्विच' ऑन कर दे। सब कुछ साफ़ दिखने लगता है।
यह मंत्र कोई रट्टा मारने वाली चीज़ नहीं है। यह तो एक 'हीलिंग ट्यून' है। जब भी लगे कि लाइफ में सब कुछ उलझ गया है, बस आँख बंद करो और इसे धीरे-धीरे गुनगुनाओ। यह मंत्र हवा की तरह तुम्हारे मन के तनाव को उड़ा ले जाएगा और पानी की तरह तुम्हारी आत्मा को शांत कर देगा।
ये मंत्र नहीं है, ये एक 'सफरनामा' है—अशांति से शांति की ओर!
इसे ऐसे समझो कि तुम एक ऐसे पेंटर हो, जिसने अपनी लाइफ का कैनवास बहुत बिखरा-बिखरा सा बना दिया है। और यह मंत्र—वो 'गोल्डन ब्रश' है जो तुम्हारी रफ पेंटिंग को मास्टरपीस बना सकता है।
हम जो अपनी आँखों से देखते हैं, वो तो बस एक फिल्म है। लेकिन इसके पीछे जो 'प्रोजेक्टर' चल रहा है, वो है— रहस्य विज्ञान।
आध्यात्म कहता है कि तुम्हारी आत्मा एक 'पावर स्टेशन' है। लेकिन उस स्टेशन पर बहुत सारी धूल जमी है। यह मंत्र उस धूल को हटाने का काम करता है। यह एक 'कोड' है जो सीधे तुम्हारी आत्मा की फ्रीक्वेंसी से मैच करता है।
जैसे फोन में एक 'सिम कार्ड' होता है, जो उसे टावर से कनेक्ट करता है। हमारा शरीर एक हार्डवेयर है। जब हम 'कृष्णाय वासुदेवाय...' कहते हैं, तो यह हमारे शरीर के सेल्स (कोशिकाओं) के साथ एक 'रेजोनेंस' पैदा करता है।
सोचो: अगर तुम एक खाली बोतल में जोर से फूंक मारो, तो एक आवाज आती है। वैसी ही आवाज तुम्हारे शरीर के भीतर से निकलती है जब तुम इस मंत्र को पूरी श्रद्धा से कहते हो। वह आवाज तुम्हारे अंदर के हर 'सेल' को एक नया सिग्नल भेजती है—"सब ठीक हो रहा है।"
क्या तुमने कभी सोचा है कि हम क्यों कहते हैं 'हरये'? 'हर' का मतलब है मिटा देना। विज्ञान कहता है—'मैटर' (पदार्थ) कभी नष्ट नहीं होता, बस बदलता है। मंत्र का रहस्य यही है—यह तुम्हारे दुःख (नकारात्मक ऊर्जा) को नष्ट नहीं करता, उसे बदल (Transform) देता है। उदासी को शांति में, डर को विश्वास में।
एक प्रैक्टिकल प्रयोग (जो तुम अभी कर सकते हो)
इसे 'आध्यात्मिक केमिस्ट्री' कहते हैं।
एक गिलास पानी लो। उसे अपने हाथ में पकड़ो।
अपनी आँखें बंद करो और बस 5 बार इस मंत्र का उच्चारण करो—बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम किसी अपने से बात कर रहे हो।
अब उस पानी को पी लो।
क्या होगा? विज्ञान कहता है कि पानी में याददाश्त (Memory) होती है। तुम्हारे शब्दों की वाइब्रेशन उस पानी के 'मॉलिक्यूल्स' को बदल देती है। जब तुम वो पानी पीते हो, तो वह शांति तुम्हारे खून में मिल जाती है।
यह है 'मंत्र-विज्ञान'। यह कोई अंधविश्वास नहीं, यह एक बहुत ही बारीक 'एनर्जी इंजीनियरिंग' है।
इसे ऐसे समझो।
विज्ञान कहता है कि फ्रीक्वेंसी सब कुछ है।
रहस्यकहता है कि कुछ चीजें आँखों से नहीं, महसूस करने से समझ आती हैं।
आध्यात्म कहता है कि तुम वो शक्ति हो जो ब्रह्मांड को चला रही है।
जब ये तीनों मिलते हैं, तो यह मंत्र एक 'ब्रह्मांडीय वाई-फाई' (Cosmic Wi-Fi) बन जाता है। तुम अपनी चिंता का 'पासवर्ड' डालते हो और शांति का 'सिग्नल' डाउनलोड कर लेते हो।
सीधी बात दुनिया की भीड़ में जब खुद को खोया हुआ पाओ, तो बस इस मंत्र के 'सिग्नल' को याद कर लेना। यह तुम्हें तुमसे ही मिलवा देगा। ये कोई रटना नहीं, ये 'खुद को ट्यून' करना है।
यह मंत्र कोई प्रार्थना नहीं, यह एक 'सॉफ्टवेयर की' है!
सोचिए, जब आप आँखें मूँदकर इसे गुनगुनाते हैं, तो आप केवल शब्द नहीं बोल रहे होते, आप अपनी चेतना के उस 'मेनफ्रेम' को एक्सेस कर रहे होते हैं जहाँ से सृष्टि का हर परमाणु संचालित होता है। यह मंत्र आपको 'अहंकार' के उस कारागार से बाहर निकाल लाता है, जिसमें आप बरसों से बंद थे।
जिस तरह उस गुफा के अंदर हज़ारों राजाओं ने कृष्ण को देखते ही अपनी बेड़ियाँ तोड़ दी थीं, ठीक वैसे ही, आपके भीतर का वह 'सच्चा स्वरूप' भी बस इस मंत्र के 'वाइब्रेशन' की एक लकीर का इंतज़ार कर रहा है। जैसे ही यह 'फ्रीक्वेंसी' आपके हृदय से टकराती है, आपके भीतर के सारे 'जरासंध'—तनाव, डर, और असुरक्षा—स्वयं ही विखंडित होने लगते हैं।
आज रात, जब दुनिया की भाग-दौड़ थम जाए, बस एक बार इस मंत्र को अपने अस्तित्व की गहराई में उतरने दीजिएगा। आप पाएंगे कि जिस शांति को आप बाहर ढूंढ रहे थे, वह तो पहले से ही आपके अंदर के 'गोविन्द' के चरणों में सुरक्षित रखी थी।"
"याद रखना, जीवन के कुरुक्षेत्र में तुम अकेले नहीं हो—तुम्हारा 'रैथ' (रथ) हाँकने वाला वह सांवला ब्रह्म आज भी तुम्हारे भीतर बैठा है, बस उसके 'सिग्नल' को ट्यून करने की देर है!"




प्रकाशक :- श्री अभिषेक कुमार, मंत्र, तंत्र, यन्त्र विशेषज्ञ, शक्ति सिद्धांत के व्याख्याता, दस महाविद्याओं के सिद्ध साधक, श्री यन्त्र और दुर्गा सप्तशती के विशेषज्ञ, ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुशास्त्री.

Mob:- 9852208378,  9525719407  

मिलने का वर्तमान पता:-
पुष्यमित्र कॉलोनी, संपतचक बाजार
(गोपालपुर थाना और केनरा बैंक के बीच/बगल वाली गली में)
इलेक्ट्रिक पोल नंबर-6 के पास
पोस्ट-सोनागोपालपुर, थाना-गोपालपुर
संपतचक, पटना-7
नोट:-संपतचक बाजार, अगमकुआँ में स्थित शीतला माता के मंदिर से लगभग 8 किमी॰ दक्षिण में स्थित है। नेशनल हाईवे - 30 के दक्षिण में एक रोड गयी है, जो पटना-गया मेन रोड के नाम से जाना जाता है। इस रोड पर ही बैरिया बस स्टैण्ड है। इसी बस स्टैण्ड के दक्षिण संपतचक बाजार स्थित है। यहीं केनरा बैंक के ठीक बगल वाली गली में मेरा मकान है। जहाँ आप सभी धर्मप्रेमी भक्तजन/जिज्ञासु समय लेकर मुझसे कभी भी मिल सकते हैं।

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